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युद्ध में उड़ान भरने वाली पहली महिला की कहानी है गुंजन सक्सेना, जाह्नवी कपूर ने किया फिल्म को कमजोर

Adhunik Samachar

लंबे इंतजार के बाद धर्मा प्रोडक्शन के बैनर की फिल्म Gunjan Saxena: The Kargil Girl (गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल) नेटफिल्स पर रिलीज हो गयी। फिल्म में जाह्नवी कपूर, पंकज त्रिपाठी, अंगद बेदी, विनीत कुमार, मानव विज, आयशा रजा, चंदन के. आनंद, आर्यन अरोरा, रीवा अरोरा जैसे बेहतरीन कलाकार हैं। फिल्म गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल भारत की पहली एयरफोर्स महिला पायलट गुंजन सक्सेना की कहानी है। फिल्म पूर्व भारतीय वायुसेना की पायलट गुंजन सक्सेना की अविश्वसनीय वास्तविक जीवन पर आधारित है। 'कारगिल गर्ल' के नाम से मशहूर गुंजन सक्‍सेना को 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान अनुकरणीय साहस दिखाने के लिए शौर्य वीर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी शुरू होती है प्लेन में भाई के साथ सफर कर रही एक बच्ची से, जिसका नाम गुंजन होता है। गुंजन विंडो वाली सीट से प्लेन के बाहर का नजारा देखना चाहती है लेकिन उसका भाई उसे मना कर देता है। प्लेन की एयर होस्टेस उसे पायलट का कॉकपिट दिखाती है। बस इस नजारे को देखकर गुंजन हवा में उड़ने की ठान लेती है। पायलट का सपना लेकर ही गुंजन सक्सेना (जाह्नवी कपूर) बड़ी हो जाती है। 10 पास होने के बाद से शुरू होता है गुंजन के पायलट बनने का सफर। पहली जंग उसे अपने समाज से लड़नी पड़ती है जहां लोग लड़कियों के पायटल बनने के खिलाफ है यहां तक की गुंजन की मां और भाई भी। लेकिन गुंजन के पिता (पंकज त्रिपाठी) का मानना है कि प्लेन चाहते लड़का उड़ाए या लड़की दोनों को पायलट ही कहते हैं। अपनी बेटी के पायटल बनने के सफर में गुंजन के पिता साथ खड़े रहते हैं। लैंगिक रुप से भेदभाव करने वाले समाज से तो गुंजन पायटल बनकर जीत जाती है। गुंजन की दूसरी जंग एयरफोर्स में शुरू होती है जहां आज से पहले कोई महिला बतौर पायलट नहीं आयी थी। एयरफोर्स जो पूरी तरह पुरुष प्रधान था वहां पर गुंजन अपने आपको कैसे साबित करती है और कैसे वह अपनी काबलियत से कारगिल की जंग में घायल सैनिकों को बचाती है ये सब कुछ आपको फिल्म में देखने का मिलेगा।

फिल्म रिव्यू 

फिल्म की कहानी गुंजन सक्सेना की जिंदगी की कहानी है जो करोड़ो लड़कियों को मोटिवेट करती है। गुंजन सक्सेना ने बहादुरी की मिसाल उस समय कायम की थी जब नावरीवाद जैसी विचारधारा का बोलबाला नहीं था। गुंजन सक्सेना की कहानी एक बेहतरी कहानी है जिसे हमने न्यूज पेपर और किताबों में पड़ा है। गुंजन ने अपनी वीरता और सूझबूझ से कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन के छक्के छुडाए और घायल भारतीय सैनिकों का रेस्क्यू भी किया।

फिल्म की कमियां 

गुंजन सक्सेना की शानदार कहानी को पर्दे पर दिखाने में फिल्म निर्माता फैल होते नजर आये हैं। एक शानदार कहानी में बॉलीवुड का तड़का डाल कर फिल्म, एयरफोर्स को विलेन बना कर फिल्म में बहुत ज्यादा ड्रामा डाल दिया गया है।

इस शानदार कहानी को कमजोर करने का आधा क्रेडिट जाह्नवी कपूर को जाता है। बाकि फिल्मों की तरह गुंजन सक्सेना में भी जाह्नवी कपूर के चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं दिख रहे हैं। गुंजन के किरदार ने जाह्नवी कपूर ने बिलकुल भी न्यान नहीं किया है। गुंजन ने कारगिल के युद्ध के दौरान ये बहादुरी का कारनामा करके दिखाना था लेकिन फिल्म में युद्ध के शॉट बहुत की ही कम डाले गये हैं। फिल्म में युद्ध की भूमिका बनाए बगैर गुंजन की बहादुरी को दिखा दिया है। मानों एक बच्चे ने शेर के मुह में हाथ डालने जैसा बहादुरी का काम किया हो लेकिन लोगों को ये पता ही न हो कि बच्चे ने किसके मुंह में हाथ डाला- शेर या लोमड़ी? क्योंकि शेर को दिखाया ही नहीं गया। फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही फीका है।

फिल्म की मजबूत कड़ियां

सबसे पहले तो फिल्म एक देशभक्ति फिल्म है, जिसमें एक वीर महिला की बहादुरी को दिखाया गया है। करोड़ो लड़कियों के सपने फिल्म को देखकर एक बार फिर जी उठेंगे।

जाह्नवी कपूर को छोड़कर फिल्म की कास्ट ने बहुत ही दमदार काम किया है। गुंजन के पिता का किरदार पंकज त्रिपाठी ने निभाया है। जब तक आप उन्हें स्क्रीन पर देखते है आपको लगेगा आप एक शानदार फिल्म देख रहे हैं। लड़कियों को कमजोर लेकिन अपनी बहन से प्यार और पहवाह करने वाले भाई के रुप में अंगद बेदी ने बहुत अच्छी भूमिका निभाई है। उनके चेहरे पर हर भाव को आप महसूस कर सकते हैं।